विश्वास
विश्वास आंतरिक है की बाह्य है? विश्वास सत्य है की मिथ्या है ? विश्वास आनंद है कि आनंद की अभिलाषा है ? विश्वास सागर की गहराई है की हिमालय की ऊंचाई है ? यूँ तो भाषा विज्ञानं की दृष्टि से देखें तो विश्वास शब्द का संधि विच्छेद कर सकते हैं - विश्वास = विश्व + आस । गौड़ भाषा में आस = आशा । तो क्या संसार से 'कुछ' आशा विश्वास है ? हाँ यह है । आशावादी होना विश्वासी होने की पहली शर्त है । संसार का यहाँ व्यापक अर्थ है या यह कहें की संसार में सब कुछ सम्मिलित है अर्थात कहीं भी, किसी से भी, कभी भी यदि आप कोई आशा रखते हैं तो आप विश्वासी हैं ।
विश्वासी होना व्यक्ति की विशेषता है और यह आंतरिक है । अब आप कह सकते हैं की एक ईश्वर में विश्वास करने वाला व्यक्ति नास्तिक हो गया अगर यह आंतरिक है तो वह बदल कैसे । वास्तव में विश्वास करने का आंतरिक गुण अभी भी उसमे हैं बस अब उसे ईश्वर के ना होने का विश्वास हो गया है । अच्छा तो विश्वास परिवर्तित हो सकता है और एकदम विपरीत भी ? हाँ हो सकता है, अरे भाई, विश्वास तो मानव मूल्य है और मानव मूल्यों को ऐसी परीक्षा में परीक्षित नहीं किया जा सकता जहाँ उत्तर मात्र दो हो सकते हों या तो सही या फिर गलत । आज जिस देश,काल, परिस्थिति में कोई चीज सही लगती है वही किसी दूसरी स्थिति में गलत हो जाती है । वही लोग जो नेहरूवादी समाजवादी विचारधारा का राग अलापते थे, सोवियत रूस की समृद्धि के कसीदे पढ़ते थे, नब्बे के दशक में उन्ही लोगों ने भारतीय बाज़ार को विश्व बाज़ार के लिए खोल दिया । और २१वीं सदी के प्रारब्ध में तो मुक्त व्यापर की संकल्पना भी वही लोग लेकर आये । बंद अर्थ व्यवस्था में विश्वास करने वाले लोगों का विश्वास अब आर्थिक भूमंडलीकरण में हो चुका है और हाँ कल यह फिर बदल सकता है ।
उपरोक्त बिन्दुओं से यह भी स्पष्ट है की विश्वासी को बाह्य कारण भी प्रभावित करते हैं, पर विश्वासी को, अविश्वासी को नहीं । देश, काल, परिस्थिति ये सब बाह्य कारण ही तो हैं । यदि तार्किकता की बात करें तो बाह्य परिस्थितियों के हिसाब से विश्वास में परिवर्तन लाना समझदारी है और यह प्राकृतिक भी । यदि एक प्रेमिका अपने प्रेमी को किसी और के साथ आलिंगन की अवस्था में देख ले तो अच्छे से अच्छा विश्वास हिल जाए, यदि ऐसा न हो तो मानविकी के विद्वान भी इसे अंध विश्वास ही कहेंगे । कुछ ज्ञानी अंध विश्वास को विश्वास का एक प्रकार कह सकते हैं । भगवान बचाये उन ज्ञानिओं से और उनके अन्धविश्वास से ।
एक प्रश्न और मन में उठता है की विश्वास और अंधविश्वास में अंतर कैसे जाने । पत्थर की मूर्ति के सामने बैठे हुए पुजारी का विश्वास उस पत्थर को भगवान बनाता है परन्तु इसका अर्थ यह नहीं की वह पुजारी उस पत्थर को पत्थर मानना ही बंद कर दे । भगवान मानों यह आपकी मर्जी है पंडित जी, पर कृपया उसे पत्थर मानने से इंकार मत करो ।भगवन मानों तो यह विश्वास है , पत्थर ना मानों तो अंधविश्वास ।
हर विश्वास का एक उद्देस्य होता है, निरुद्देस्य विश्वास तो भटकाव है , बिखराव है । कहीं इसका मतलब यह तो नहीं की विश्वासी मतलबी होते हैं । बिलकुल नहीं मित्र, विश्वासी मतलबी नहीं अर्थयुक्त होते हैं । आज प्रबुद्ध समाज का विश्वास लोकतंत्र में है यह अकारण तो नहीं, वर्तमान युग में समता,स्वतंत्रता, भाईचारा लोकतंत्र ही दे सकते हैं इसलिए हमारा यह विश्वास है। हम अपने प्रेमी पर विश्वास करते हैं तो वह क्या किसी अर्थ के लिए होता है - हाँ इस अर्थ के लिए की मैं उसका प्रेमी बना रहूँ । प्रेम की भावना अकारण तो नहीं जागती, आपको सबसे तो प्रेम नहीं होता । कुछ तो अन्तर्निहित या बहिर्गुण होते ही हैं जो आपको आकर्षित करते हैं । कुछ कारण विश्वास बनाते हैं और कुछ कारण विश्वास को मजबूत करते हैं। ये कारण आतंरिक या बाह्य दोनों हो सकते हैं । एक चींटी को आप बार-बार दीवाल पर चढ़ते हुए गिरते और उतरते देखते हैं, यदि वह अंत में दीवाल पर चढ़ जाती है तो आपको मेहनत पर विश्वास हो सकता है । यह छोटी सी बाह्य घटना आपके आंतरिक विश्वासी ह्रदय को जगा देती है ।
विश्वास की इमारत मजबूत आधारशिला पर खड़ी होती है । गांधी जी जब अफ्रीका गए तो उनको विश्वास था कि एक मानव दुसरे मानव से भिन्न नहीं हो सकता न ही एक मानव के अधिकार दुसरे मानव से कम हो सकते हैं । इस विश्वास ने ही उनको अश्वेतों के अधिकारों हेतु लड़ने को प्रेरित किया । वहां की लड़ाई जीतने के बाद जब वो भारत आये तो इस विश्वास के साथ आये कि जब दूसरे देश में अधिकारों की स्वतंत्रता के लिए लड़ा जा सकता है, जीता जा सकता है तो अपने देश में तो सफलता पाई ही जा सकती है । मानव सामान है यह विश्वास की आधारशिला है और जहाँ उसे असमान माना जा रहा है, वहां उसे समानता के लिए मनवाया जा सकता है यह उस विश्वास की मजबूती है । जब विश्वास को समर्थन मिलता है या यूँ कहें कि बहुत लोगों के विश्वासों में समानता आ जाती है, तो यह पोषक का काम करती है।
विश्वास आवश्यक है । एक हांथी जिसको बचपन से एक खूंटे से बाँधा जाता है वह वयस्क होने पर उस खूंटे को उखाड़ फेंकने की सामर्थ्य तो रखता है पर यह विश्वास उसे नहीं रहता क्योंकि बचपन से उसे इस विश्वास की आधारशिला ही नहीं मिली, बचपन में उसने उस खूंटे की रस्सी को तोड़ने का प्रयास तो किया पर बारम्बार असफल रहने पर नकारात्मक विश्वास पाल लिया कि महावत ही मेरा स्वामी है और रस्सी मेरा दुर्भाग्ययुक्त अकाट्य बंधन। एक बार बचपन में मुझे ज्वर (बुखार ) आने लगा तो मेरी माता जी ने कहा की मौसम का परिवतन है एक दो दिन में ठीक हो जायेगा पर मैं डॉक्टर के पास जाने की जिद की , डॉक्टर परिचित थे उन्होंने विटामिन की कुछ गोली दी और बोला दवाई नियमित टाइम से ढूध के साथ लेना, मैंने एक ही बार दवा खाई और बुखार काफूर हो गया । कई बार विश्वास से असंभव चीजें संभव हो जाती हैं। अंग्रेजी विद्वान आजकल इसी चीज को पॉजिटिव थिंकिंग कहते हैं । चन्द्र को देख कर नील आर्मस्ट्रांग अवश्य सोंचते रहे होंगे "एक दिन मैं वहां जरूर पहुँचूंगा " और वे पहुंचे ।
मुंडकोपनिषद् से लिया गया भारत का राष्ट्रीय आदर्श वाक्य "सत्यमेव जयते" क्या विश्वास का ही प्रतीक नहीं है । इस विश्वास को बनाने के लिए महाभारत में पांडवों ने कौरवों पर विजय प्राप्त की, कृष्ण ने कंश को समाप्त कर दिया मीरा ने राणा द्वारा दिया गया विष का प्याला पी लिया और भगत सिँह, राजगुरु फांसी पर लटक गए । भारत में तो प्रतिदिन ही ऐसे उदाहरण मिल जायेंगे । न्यायालयों की संकल्पना ही इसी विश्वास पर आधारित है। सत्तर के दशक में जब सर्वोच्च न्यायालय ने आधारभूत संरचना की संकल्पना रखी तो कितने ही हृदयों का विश्वास लोकतंत्र में पुनः लौट आया होगा । पर ब्रिटिश राज में तो न्यायालय न्याय को धता बता कर महारानी को खुश करने वाले निर्णय दिया करते थे , हाँ देते थे पर इससे न्याय की सुंदरता कम नहीं हुई न ही नयायालय की उपयोगिता पर विश्वास ही खत्म हुआ बस हांड मांस को समेटे हुए उन गोरी चमड़ियों पर विश्वास समाप्त हुआ जिनका काम यूँ तो न्याय का संगीत बजाना था पर वो तो काले कोट को पहन कर भी महारानी की ही ढपली बजा रहे थे ।
विश्वास प्रेम की शुरुवात है, विश्वास करना कला है, मनुष्यता की पहचान है । गुफाओं में रहने वाला मनुष्य आज यदि चाँद और मंगल में घर बनाने की इच्छा रखता है तो यह उसका अपनी काबिलियत पर विश्वास ही तो है । एक समय आग जलाना भी ना जानने वाला मनुष्य यदि आज परमाणु हथियारों से खेलने की धमकिया देता है तो यह उसका विश्वास ही तो है । खैर, विश्वास के विषय में इतना लिखने की प्रेरणा इस विश्वास ने ही दी की यह विषय मैं समझता हूँ और जो मैं कहना चाहता हूँ पाठक वो समझ जायेंगे इसका मुझे विश्वास ही तो है ।
-विजय कुमार शुक्ल
१९ सितम्बर २०१४
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